आखिरी चिट्ठी

एक छोटे-से गाँव में आरव नाम का लड़का रहता था। उसके पिता किसान थे और माँ घर संभालती थीं। आरव पढ़ाई में ठीक था, लेकिन उसका सपना था कि एक दिन वह अपने गाँव से बाहर जाकर कुछ बड़ा करेगा।


एक दिन शहर में नौकरी के लिए उसका चयन हो गया। घर में खुशी का माहौल था। जाते समय उसकी माँ ने उसे एक छोटी-सी पुरानी डायरी दी और कहा, “जब भी रास्ता मुश्किल लगे, इसमें अपने मन की बात लिख देना।”


शहर पहुँचकर आरव ने मेहनत शुरू कर दी। शुरुआत में सब अच्छा था, लेकिन कुछ महीनों बाद नौकरी में परेशानी आने लगी। उसके काम की तारीफ करने के बजाय लोग उसकी गलतियाँ निकालने लगे। एक दिन उसके अधिकारी ने उसे सबके सामने डाँट दिया।


उस रात आरव बहुत निराश हुआ। उसे लगा कि शायद वह अपने सपने के लायक नहीं है। उसने डायरी खोली और लिखा, “शायद मुझे वापस गाँव चले जाना चाहिए।”


अगले दिन घर से एक चिट्ठी आई। माँ ने लिखा था—


“बेटा, खेत में बीज बोने के बाद किसान रोज मिट्टी हटाकर यह नहीं देखता कि पौधा निकला या नहीं। वह बस पानी देता है और इंतजार करता है। मेहनत का फल भी ऐसा ही होता है। थोड़ा समय लगता है।”


आरव ने चिट्ठी कई बार पढ़ी।


उसने नौकरी छोड़ने का फैसला बदल दिया। उसने अपनी गलतियों से सीखना शुरू किया और हर दिन पहले से बेहतर काम करने लगा। कुछ महीनों बाद वही अधिकारी, जिसने उसे डाँटा था, एक बड़े प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी आरव को देने लगा।


दो साल बाद आरव अपने गाँव वापस आया। इस बार वह खाली हाथ नहीं था। उसने अपने माता-पिता के लिए नया घर बनवाया और गाँव के बच्चों के लिए एक छोटी-सी लाइब्रेरी भी शुरू की।


उसने अपनी पुरानी डायरी खोली। आखिरी पन्ने पर उसने लिखा—


“कभी-कभी जिंदगी हमें रोकने के लिए मुश्किलें नहीं देती, बल्कि यह देखने के लिए देती है कि हम कितनी दूर तक चल सकते हैं।”


माँ ने डायरी पढ़ी और मुस्कुराकर कहा, “मैंने कहा था ना बेटा, बस पानी देते रहना।”


आरव भी मुस्कुरा दिया।


उसे समझ आ चुका था कि सफलता हमेशा तेज दौड़ने से नहीं मिलती, कभी-कभी बस हार न मानने से मिलती है।

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