आधी रात का बंद कमरा
उत्तराखंड के पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव इतना शांत था कि रात के समय हवा की आवाज़ भी साफ सुनाई देती थी। लेकिन उस गाँव की शांति के पीछे एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसके बारे में बुज़ुर्ग आज भी बात करने से डरते थे

गाँव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली थी।
लोग उसे "काली हवेली" कहते थे।
हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर हमेशा एक भारी जंग लगा ताला लटका रहता था।
सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली में कोई रहता नहीं था।
फिर भी हर रात ठीक बारह बजे, हवेली की ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में पीली रोशनी दिखाई देती थी।
गाँव वालों का कहना था कि वह रोशनी पिछले तीस सालों से हर रात जलती थी।
लेकिन किसी ने कभी अंदर जाकर यह देखने की हिम्मत नहीं की कि आखिर वह रोशनी जलाता कौन है।
एक अजीब चिट्ठी
शहर में रहने वाला आरव इन बातों को सिर्फ गाँव की बनाई हुई कहानी मानता था।
एक दिन उसे अपने दादाजी की मृत्यु की खबर मिली। आरव तुरंत देवगढ़ पहुँच गया।
दादाजी का घर वही पुराना मकान था, जहाँ आरव बचपन में गर्मियों की छुट्टियाँ बिताया करता था।
अंतिम संस्कार के बाद घर की सफाई करते समय आरव को लकड़ी की एक पुरानी संदूकची मिली।
संदूकची पर एक छोटा-सा ताला लगा था।
उसकी चाबी दादाजी की पुरानी घड़ी के पीछे छिपी हुई थी।
आरव ने संदूक खोला।
अंदर पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और एक चिट्ठी थी।
चिट्ठी के ऊपर लिखा था—
"आरव के लिए। लेकिन इसे रात में पढ़ना।"
आरव को यह देखकर हैरानी हुई।
उसने चिट्ठी खोल ली।
अंदर केवल कुछ पंक्तियाँ थीं—
"अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो, तो समझो मेरा समय खत्म हो चुका है। काली हवेली में जाओ। ऊपर की मंजिल पर कमरा नंबर 13 ढूँढना। वहाँ तुम्हें वह सच मिलेगा जिसे मैंने पूरी जिंदगी छिपाकर रखा। लेकिन ध्यान रखना—कमरे का दरवाजा रात 12:13 से पहले मत खोलना।"
आरव कुछ देर तक चुपचाप चिट्ठी को देखता रहा।
उसे यकीन नहीं हुआ कि उसके दादाजी ने ऐसी बात लिखी होगी।
लेकिन नीचे एक और लाइन थी—
"और अगर दरवाजे के पीछे से मेरी आवाज़ सुनाई दे, तो जवाब मत देना।"
आरव के हाथ ठंडे पड़ गए।
हवेली की ओर
उस रात गाँव में तेज बारिश हो रही थी।
घड़ी में 11 बजकर 40 मिनट हो चुके थे।
आरव ने टॉर्च उठाई और हवेली की ओर चल पड़ा।
जैसे-जैसे वह हवेली के करीब पहुँचा, हवा तेज होती गई।
मुख्य दरवाजे के सामने पहुँचकर उसने देखा कि ताला जमीन पर पड़ा था।
दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
आरव ने धीरे से दरवाजा धकेला।
क्रीईईईक...
आवाज पूरे मकान में गूँज गई।
अंदर घुप अंधेरा था।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।
एक चित्र के सामने पहुँचकर आरव रुक गया।
उस चित्र में एक परिवार खड़ा था।
तीन लोग थे—एक आदमी, एक महिला और करीब दस साल का बच्चा।
चित्र के नीचे तारीख लिखी थी—
1926
लेकिन बच्चे के चेहरे को किसी ने खुरचकर मिटा दिया था।
आरव आगे बढ़ गया।
सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं।
पहली मंजिल पर कई कमरे थे, लेकिन कमरे नंबर 13 का कहीं नाम नहीं था।
वह दूसरी मंजिल पर पहुँचा।
वहाँ गलियारे के अंत में एक बंद दरवाजा था।
दरवाजे पर पीतल की प्लेट लगी थी—
13
आरव की धड़कन तेज हो गई।
उसने घड़ी देखी।
12:05
अभी आठ मिनट बाकी थे।
वह दरवाजे के सामने खड़ा रहा।
अचानक अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
ठक... ठक... ठक...
आरव पीछे हट गया।
फिर आवाज़ आई—
"आरव..."
वह जम गया।
वह आवाज़ उसके दादाजी की थी।
"आरव... दरवाजा खोलो।"
आरव को चिट्ठी की आखिरी लाइन याद आ गई—
"अगर दरवाजे के पीछे से मेरी आवाज़ सुनाई दे, तो जवाब मत देना।"
उसने होंठ बंद रखे।
अंदर से फिर आवाज़ आई—
"मुझे बाहर निकालो, आरव।"
लेकिन आरव जानता था कि उसके दादाजी अब इस दुनिया में नहीं थे।
12:13
घड़ी ने 12:13 बजाए।
उसी क्षण दरवाजे का ताला अपने आप गिर गया।
आरव ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला।
कमरा पूरी तरह खाली था।
सिर्फ बीच में एक पुरानी मेज थी।
मेज पर एक लालटेन जल रही थी।
और उसके पास एक डायरी रखी थी।
आरव ने डायरी उठाई।
पहल पन्ने पर लिखा था—
"जिसे यह डायरी मिले, वह आगे पढ़ने से पहले बाहर निकल जाए।"
आरव कुछ पल रुका।
फिर उसने पन्ना पलट दिया।
डायरी उसके दादाजी की थी।
तीस साल पुराना रहस्य
डायरी में लिखा था—
"साल 1994। मैं और मेरे दोस्त सुरेश पहली बार काली हवेली में गए थे। हमें लगा था कि यहाँ कोई पुराना खजाना छिपा है। लेकिन हमें खजाना नहीं मिला। हमें एक तहखाना मिला।"
अगले पन्ने पर लिखा था—
"तहखाने में एक कमरा था, जिसमें दीवार पर दर्जनों घड़ियाँ लगी थीं। सभी घड़ियाँ बंद थीं। सिर्फ एक घड़ी चल रही थी। उसमें हमेशा 12:13 बज रहे थे।"
आरव का गला सूख गया।
उसने अगला पन्ना पलटा।
"कमरे के बीच एक बड़ा आईना था। सुरेश ने उसमें देखा तो उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिखा। उसने मुझे देखा और कहा—'इस आईने में कोई और खड़ा है।'"
अगले पन्ने पर कुछ शब्द काँपते हुए लिखे थे—
"मैंने आईने में देखा। वहाँ मेरा प्रतिबिंब था... लेकिन वह मुस्कुरा रहा था। जबकि मैं मुस्कुरा नहीं रहा था।"
आरव ने डायरी बंद कर दी।
कमरे में अचानक ठंडी हवा चली।
लालटेन की लौ हिलने लगी।
उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे खड़ा है।
उसने धीरे से पीछे देखा।
कोई नहीं था।
लेकिन दीवार पर उसकी परछाई दिखाई दे रही थी।
और वह परछाई...
उसकी हरकतों से एक पल देर से चल रही थी।
आरव डरकर पीछे हट गया।
परछाई भी पीछे हटी
लेकिन एक सेकंड बाद।
तहखाना
डायरी के अगले पन्ने में लिखा था—
"अगर कभी कोई मेरे बाद यहाँ आए, तो तहखाने में मत जाना। वहाँ जो कुछ है, वह इंसान नहीं है।"
लेकिन उसी पन्ने के नीचे एक नक्शा बना था।
आरव ने नक्शे को ध्यान से देखा।
कमरे नंबर 13 की फर्श के नीचे एक गुप्त रास्ता था।
उसने फर्श पर हाथ फेरा।
एक जगह लकड़ी थोड़ी ढीली थी।
उस हटाते ही नीचे पत्थर की सीढ़ियाँ दिखाई दीं।
आरव कुछ देर सोचता रहा।
फिर वह नीचे उतर गया।
सीढ़ियाँ बहुत लंबी थीं।
लगभग दो मिनट बाद वह तहखाने में पहुँचा।
वहाँ सैकड़ों पुरानी घड़ियाँ दीवारों पर लगी थीं।
हर घड़ी अलग समय दिखा रही थी।
लेकिन बीच में एक बड़ी घड़ी थी।
उसमें समय था—
12:13
आरव उसके पास गया।
घड़ी के नीचे एक नाम लिखा था—
"माधव शर्मा"
आरव चौंक गया।
यह उसके दादाजी का नाम था।
घड़ी के नीचे एक छोटा-सा बटन था।
उसने उसे दबाया।
दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुल गया।
अंदर एक छोटा कमरा था।
कमरे में वही बड़ा आईना रखा था, जिसका जिक्र डायरी में था।
आरव आईने के सामने खड़ा हो गया।
इस बार उसका प्रतिबिंब बिल्कुल सामान्य था।
उसने हाथ उठाया।
प्रतिबिंब ने भी हाथ उठाया।
वह पीछे हटा।
प्रतिबिंब भी पीछे हटा।
आरव को थोड़ी राहत मिली।
तभी आईने में उसके पीछे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।
आरव ने तुरंत पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
उसने फिर आईने में देखा।
बूढ़ा आदमी अब भी खड़ा था।
वह उसके दादाजी थे।
दादाजी ने आईने के अंदर से हाथ उठाया।
और होंठों से कहा—
"भाग जाओ।"
उसी पल पूरे तहखाने की घड़ियाँ एक साथ चलने लगीं।
टिक... टिक... टिक...
फिर सभी घड़ियाँ 12:14 पर पहुँच गईं।
आईने में दरार पड़ गई।
सच्चाई
आरव ने डायरी का आखिरी पन्ना याद किया।
वह वापस मुड़ा।
लेकिन रास्ता बंद था।
दीवार पर अचानक शब्द उभरने लगे—
"एक आदमी अंदर आएगा। एक आदमी बाहर जाएगा।"
आरव समझ नहीं पा रहा था कि इसका मतलब क्या है।
तभी उसे दादाजी की चिट्ठी याद आई।
"जिसे यह डायरी मिले..."
उसने डायरी फिर खोली।
आखिरी पन्ने पर एक वाक्य था, जिसे उसने पहले नहीं देखा था।
"मैंने उस रात अपने प्रतिबिंब को बाहर आने दिया था। उसके बाद जो व्यक्ति घर लौटा... वह मैं नहीं था।"
आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसका मतलब था—
जिस दादाजी को वह इतने सालों से अपना दादाजी समझता रहा...
शायद वह असली दादाजी थे ही नहीं।
आरव की आँखें आईने पर टिक गईं।
आईने में अब उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।
लेकिन आरव नहीं मुस्कुरा रहा था।
प्रतिबिंब ने धीरे से अपना हाथ आईने पर रखा।
और फिर आईने के अंदर से आवाज़ आई—
"अब मेरी बारी है।"
आरव पीछे हट गया।
अचानक कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।
कुछ सेकंड बाद रोशनी वापस आई।
आईना बिल्कुल सामान्य था।
आरव उसमें दिखाई दे रहा था।
लेकिन इस बार...
आईने में दो आरव खड़े थे।
एक बाहर।
एक अंदर।
अगली सुब
गाँव वालों ने सुबह देखा कि काली हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।
अंदर आरव की टॉर्च पड़ी थी
लेकिन आरव कहीं नहीं था।
पुलिस आई।
हवेली की तलाशी ली गई।
कमरा नंबर 13 खाली था।
तहखाना भी मिला।
लेकिन वहाँ कोई आईना नहीं था।
सिर्फ एक पुरानी घड़ी थी।
उसकी सुइयाँ 12:13 पर रुकी हुई थीं।
आरव का कोई सुराग नहीं मिला।
तीन दिन बाद गाँव के एक बुजुर्ग को आरव के घर के बाहर एक लिफाफा मिला।
लिफाफे पर लिखा था—
"दादाजी के लिए।"
अंदर सिर्फ एक फोटो थी।
फोटो में आरव अपने दादाजी के साथ खड़ा था।
लेकिन फोटो देखकर बुजुर्ग के चेहरे का रंग उड़ गया।
क्योंकि फोटो में आरव के पीछे काली हवेली दिखाई दे रही थी।
और हवेली की ऊपरी खिड़की में...
आरव खड़ा था।
लेकिन वह आरव नहीं था जिसे गाँव वाले जानते थे।
वह आईने वाला आरव था।
फोटो के पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
"अब दरवाजा हमेशा खुला रहेगा।"
उस रात ठीक 12:13 बजे...
काली हवेली की ऊपरी खिड़की में फिर से पीली रोशनी जली।
और पहली बार गाँव वालों ने हवेली के अंदर से किसी की आवाज़ सुनी—
"अगला कौन आएगा?"
उसके बाद देवगढ़ में एक नया नियम बना।
रात के समय कोई भी काली हवेली की तरफ नहीं जाएगा।
लेकिन हर साल...
ठीक उसी तारीख को...
गाँव के किसी न किसी घर के दरवाजे पर एक पुरानी चिट्ठी मिलती थी।
और हर चिट्ठी पर एक ही वाक्य लिखा होता—
"कमरा नंबर 13 अभी भी खाली है।"

गाँव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली थी।
लोग उसे "काली हवेली" कहते थे।
हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर हमेशा एक भारी जंग लगा ताला लटका रहता था।
सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली में कोई रहता नहीं था।
फिर भी हर रात ठीक बारह बजे, हवेली की ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में पीली रोशनी दिखाई देती थी।
गाँव वालों का कहना था कि वह रोशनी पिछले तीस सालों से हर रात जलती थी।
लेकिन किसी ने कभी अंदर जाकर यह देखने की हिम्मत नहीं की कि आखिर वह रोशनी जलाता कौन है।
एक अजीब चिट्ठी
शहर में रहने वाला आरव इन बातों को सिर्फ गाँव की बनाई हुई कहानी मानता था।
एक दिन उसे अपने दादाजी की मृत्यु की खबर मिली। आरव तुरंत देवगढ़ पहुँच गया।
दादाजी का घर वही पुराना मकान था, जहाँ आरव बचपन में गर्मियों की छुट्टियाँ बिताया करता था।
अंतिम संस्कार के बाद घर की सफाई करते समय आरव को लकड़ी की एक पुरानी संदूकची मिली।
संदूकची पर एक छोटा-सा ताला लगा था।
उसकी चाबी दादाजी की पुरानी घड़ी के पीछे छिपी हुई थी।
आरव ने संदूक खोला।
अंदर पुराने कागज, कुछ तस्वीरें और एक चिट्ठी थी।
चिट्ठी के ऊपर लिखा था—
"आरव के लिए। लेकिन इसे रात में पढ़ना।"
आरव को यह देखकर हैरानी हुई।
उसने चिट्ठी खोल ली।
अंदर केवल कुछ पंक्तियाँ थीं—
"अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो, तो समझो मेरा समय खत्म हो चुका है। काली हवेली में जाओ। ऊपर की मंजिल पर कमरा नंबर 13 ढूँढना। वहाँ तुम्हें वह सच मिलेगा जिसे मैंने पूरी जिंदगी छिपाकर रखा। लेकिन ध्यान रखना—कमरे का दरवाजा रात 12:13 से पहले मत खोलना।"
आरव कुछ देर तक चुपचाप चिट्ठी को देखता रहा।
उसे यकीन नहीं हुआ कि उसके दादाजी ने ऐसी बात लिखी होगी।
लेकिन नीचे एक और लाइन थी—
"और अगर दरवाजे के पीछे से मेरी आवाज़ सुनाई दे, तो जवाब मत देना।"
आरव के हाथ ठंडे पड़ गए।
हवेली की ओर
उस रात गाँव में तेज बारिश हो रही थी।
घड़ी में 11 बजकर 40 मिनट हो चुके थे।
आरव ने टॉर्च उठाई और हवेली की ओर चल पड़ा।
जैसे-जैसे वह हवेली के करीब पहुँचा, हवा तेज होती गई।
मुख्य दरवाजे के सामने पहुँचकर उसने देखा कि ताला जमीन पर पड़ा था।
दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
आरव ने धीरे से दरवाजा धकेला।
क्रीईईईक...
आवाज पूरे मकान में गूँज गई।
अंदर घुप अंधेरा था।
दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे।
एक चित्र के सामने पहुँचकर आरव रुक गया।
उस चित्र में एक परिवार खड़ा था।
तीन लोग थे—एक आदमी, एक महिला और करीब दस साल का बच्चा।
चित्र के नीचे तारीख लिखी थी—
1926
लेकिन बच्चे के चेहरे को किसी ने खुरचकर मिटा दिया था।
आरव आगे बढ़ गया।
सीढ़ियाँ ऊपर जा रही थीं।
पहली मंजिल पर कई कमरे थे, लेकिन कमरे नंबर 13 का कहीं नाम नहीं था।
वह दूसरी मंजिल पर पहुँचा।
वहाँ गलियारे के अंत में एक बंद दरवाजा था।
दरवाजे पर पीतल की प्लेट लगी थी—
13
आरव की धड़कन तेज हो गई।
उसने घड़ी देखी।
12:05
अभी आठ मिनट बाकी थे।
वह दरवाजे के सामने खड़ा रहा।
अचानक अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
ठक... ठक... ठक...
आरव पीछे हट गया।
फिर आवाज़ आई—
"आरव..."
वह जम गया।
वह आवाज़ उसके दादाजी की थी।
"आरव... दरवाजा खोलो।"
आरव को चिट्ठी की आखिरी लाइन याद आ गई—
"अगर दरवाजे के पीछे से मेरी आवाज़ सुनाई दे, तो जवाब मत देना।"
उसने होंठ बंद रखे।
अंदर से फिर आवाज़ आई—
"मुझे बाहर निकालो, आरव।"
लेकिन आरव जानता था कि उसके दादाजी अब इस दुनिया में नहीं थे।
12:13
घड़ी ने 12:13 बजाए।
उसी क्षण दरवाजे का ताला अपने आप गिर गया।
आरव ने कांपते हाथों से दरवाजा खोला।
कमरा पूरी तरह खाली था।
सिर्फ बीच में एक पुरानी मेज थी।
मेज पर एक लालटेन जल रही थी।
और उसके पास एक डायरी रखी थी।
आरव ने डायरी उठाई।
पहल पन्ने पर लिखा था—
"जिसे यह डायरी मिले, वह आगे पढ़ने से पहले बाहर निकल जाए।"
आरव कुछ पल रुका।
फिर उसने पन्ना पलट दिया।
डायरी उसके दादाजी की थी।
तीस साल पुराना रहस्य
डायरी में लिखा था—
"साल 1994। मैं और मेरे दोस्त सुरेश पहली बार काली हवेली में गए थे। हमें लगा था कि यहाँ कोई पुराना खजाना छिपा है। लेकिन हमें खजाना नहीं मिला। हमें एक तहखाना मिला।"
अगले पन्ने पर लिखा था—
"तहखाने में एक कमरा था, जिसमें दीवार पर दर्जनों घड़ियाँ लगी थीं। सभी घड़ियाँ बंद थीं। सिर्फ एक घड़ी चल रही थी। उसमें हमेशा 12:13 बज रहे थे।"
आरव का गला सूख गया।
उसने अगला पन्ना पलटा।
"कमरे के बीच एक बड़ा आईना था। सुरेश ने उसमें देखा तो उसे अपना प्रतिबिंब नहीं दिखा। उसने मुझे देखा और कहा—'इस आईने में कोई और खड़ा है।'"
अगले पन्ने पर कुछ शब्द काँपते हुए लिखे थे—
"मैंने आईने में देखा। वहाँ मेरा प्रतिबिंब था... लेकिन वह मुस्कुरा रहा था। जबकि मैं मुस्कुरा नहीं रहा था।"
आरव ने डायरी बंद कर दी।
कमरे में अचानक ठंडी हवा चली।
लालटेन की लौ हिलने लगी।
उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे खड़ा है।
उसने धीरे से पीछे देखा।
कोई नहीं था।
लेकिन दीवार पर उसकी परछाई दिखाई दे रही थी।
और वह परछाई...
उसकी हरकतों से एक पल देर से चल रही थी।
आरव डरकर पीछे हट गया।
परछाई भी पीछे हटी
लेकिन एक सेकंड बाद।
तहखाना
डायरी के अगले पन्ने में लिखा था—
"अगर कभी कोई मेरे बाद यहाँ आए, तो तहखाने में मत जाना। वहाँ जो कुछ है, वह इंसान नहीं है।"
लेकिन उसी पन्ने के नीचे एक नक्शा बना था।
आरव ने नक्शे को ध्यान से देखा।
कमरे नंबर 13 की फर्श के नीचे एक गुप्त रास्ता था।
उसने फर्श पर हाथ फेरा।
एक जगह लकड़ी थोड़ी ढीली थी।
उस हटाते ही नीचे पत्थर की सीढ़ियाँ दिखाई दीं।
आरव कुछ देर सोचता रहा।
फिर वह नीचे उतर गया।
सीढ़ियाँ बहुत लंबी थीं।
लगभग दो मिनट बाद वह तहखाने में पहुँचा।
वहाँ सैकड़ों पुरानी घड़ियाँ दीवारों पर लगी थीं।
हर घड़ी अलग समय दिखा रही थी।
लेकिन बीच में एक बड़ी घड़ी थी।
उसमें समय था—
12:13
आरव उसके पास गया।
घड़ी के नीचे एक नाम लिखा था—
"माधव शर्मा"
आरव चौंक गया।
यह उसके दादाजी का नाम था।
घड़ी के नीचे एक छोटा-सा बटन था।
उसने उसे दबाया।
दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुल गया।
अंदर एक छोटा कमरा था।
कमरे में वही बड़ा आईना रखा था, जिसका जिक्र डायरी में था।
आरव आईने के सामने खड़ा हो गया।
इस बार उसका प्रतिबिंब बिल्कुल सामान्य था।
उसने हाथ उठाया।
प्रतिबिंब ने भी हाथ उठाया।
वह पीछे हटा।
प्रतिबिंब भी पीछे हटा।
आरव को थोड़ी राहत मिली।
तभी आईने में उसके पीछे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।
आरव ने तुरंत पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
उसने फिर आईने में देखा।
बूढ़ा आदमी अब भी खड़ा था।
वह उसके दादाजी थे।
दादाजी ने आईने के अंदर से हाथ उठाया।
और होंठों से कहा—
"भाग जाओ।"
उसी पल पूरे तहखाने की घड़ियाँ एक साथ चलने लगीं।
टिक... टिक... टिक...
फिर सभी घड़ियाँ 12:14 पर पहुँच गईं।
आईने में दरार पड़ गई।
सच्चाई
आरव ने डायरी का आखिरी पन्ना याद किया।
वह वापस मुड़ा।
लेकिन रास्ता बंद था।
दीवार पर अचानक शब्द उभरने लगे—
"एक आदमी अंदर आएगा। एक आदमी बाहर जाएगा।"
आरव समझ नहीं पा रहा था कि इसका मतलब क्या है।
तभी उसे दादाजी की चिट्ठी याद आई।
"जिसे यह डायरी मिले..."
उसने डायरी फिर खोली।
आखिरी पन्ने पर एक वाक्य था, जिसे उसने पहले नहीं देखा था।
"मैंने उस रात अपने प्रतिबिंब को बाहर आने दिया था। उसके बाद जो व्यक्ति घर लौटा... वह मैं नहीं था।"
आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसका मतलब था—
जिस दादाजी को वह इतने सालों से अपना दादाजी समझता रहा...
शायद वह असली दादाजी थे ही नहीं।
आरव की आँखें आईने पर टिक गईं।
आईने में अब उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।
लेकिन आरव नहीं मुस्कुरा रहा था।
प्रतिबिंब ने धीरे से अपना हाथ आईने पर रखा।
और फिर आईने के अंदर से आवाज़ आई—
"अब मेरी बारी है।"
आरव पीछे हट गया।
अचानक कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।
कुछ सेकंड बाद रोशनी वापस आई।
आईना बिल्कुल सामान्य था।
आरव उसमें दिखाई दे रहा था।
लेकिन इस बार...
आईने में दो आरव खड़े थे।
एक बाहर।
एक अंदर।
अगली सुब
गाँव वालों ने सुबह देखा कि काली हवेली का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।
अंदर आरव की टॉर्च पड़ी थी
लेकिन आरव कहीं नहीं था।
पुलिस आई।
हवेली की तलाशी ली गई।
कमरा नंबर 13 खाली था।
तहखाना भी मिला।
लेकिन वहाँ कोई आईना नहीं था।
सिर्फ एक पुरानी घड़ी थी।
उसकी सुइयाँ 12:13 पर रुकी हुई थीं।
आरव का कोई सुराग नहीं मिला।
तीन दिन बाद गाँव के एक बुजुर्ग को आरव के घर के बाहर एक लिफाफा मिला।
लिफाफे पर लिखा था—
"दादाजी के लिए।"
अंदर सिर्फ एक फोटो थी।
फोटो में आरव अपने दादाजी के साथ खड़ा था।
लेकिन फोटो देखकर बुजुर्ग के चेहरे का रंग उड़ गया।
क्योंकि फोटो में आरव के पीछे काली हवेली दिखाई दे रही थी।
और हवेली की ऊपरी खिड़की में...
आरव खड़ा था।
लेकिन वह आरव नहीं था जिसे गाँव वाले जानते थे।
वह आईने वाला आरव था।
फोटो के पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
"अब दरवाजा हमेशा खुला रहेगा।"
उस रात ठीक 12:13 बजे...
काली हवेली की ऊपरी खिड़की में फिर से पीली रोशनी जली।
और पहली बार गाँव वालों ने हवेली के अंदर से किसी की आवाज़ सुनी—
"अगला कौन आएगा?"
उसके बाद देवगढ़ में एक नया नियम बना।
रात के समय कोई भी काली हवेली की तरफ नहीं जाएगा।
लेकिन हर साल...
ठीक उसी तारीख को...
गाँव के किसी न किसी घर के दरवाजे पर एक पुरानी चिट्ठी मिलती थी।
और हर चिट्ठी पर एक ही वाक्य लिखा होता—
"कमरा नंबर 13 अभी भी खाली है।"
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